Thursday, September 13, 2018

एक यात्रा अंतर्मुखी से बहिर्मुखी पार्ट १

हेलो दोस्तों नमस्कार मेरा नाम अभिषेक है मै टीसा के दिल्ली चैप्टर से हु |  पिछले 3 सालों में मैंने कोई पोस्ट नहीं लिखी मैं अपने परिवारिक तथा बिजनेस मैं उलझ कर रह गया था अपने आप को परिवार तथा बिजनेस के अंदर ही सीमित कर लिया था बाहरी दुनिया से पूरी तरह से कट गया था लेकिन पिछले सात आठ महीनों से फिर से जुड़ने की कोशिश कर रहा हूं 2014 में मेरी शादी हुई शादी के 4
महीने पहले मेरी मम्मी एक्सपायर कर गई थी और शादी के छह-सात महीने बाद घर में बटवारा हो गया बिजनेस में बटवारा हो गया चाचा पापा अलग हो गए |  मैं उस समय mTS में जॉब कर रहा था समझ में नहीं आ रहा था कि मैं अपने कैरियर के साथ आगे बढ़ो या अपने कैरियर को छोड़कर पापा के बिजनेस में उनका सहयोग करे  या अपने परिवार को संभाले  उसी समय करीब 7 महीने पहले नया नया स्कूल भी खुला था स्कूल की  स्टार्टिंग खराब हो गई काफी समय तक अपने घर  मैं समझौता कराने  की कोशिश किया उतना सफलता नहीं मिली आसपास के लोगों की पॉलिटिक्स भी जुड़ी हुई थी इस दुनिया के तौर तरीकों से मैं बिल्कुल अपरिचित था मैं तब तक हकलाने को ही अपना सबसे बड़ी समस्या मानता था मुझे ऐसा लगता था हकलाना सही हो गया तो शायद मैं कुछ भी कर सकता हूं लेकिन जब रियल लाइफ में जिम्मेदारी आई तो लगा हकलाना तो बहुत छोटी सी बात है इतनी  मानसिक द्वंद के बीच मेरे पास मात्र एक ही विकल्प बचा था कि मैं अपने परिवार को पहले संभालु  2 बहन के शादी की जिम्मेदारी थी बिजनेस को बचाना था क्योंकि घर की आजीविका का साधन वही था स्कूल को चलाना नाक का सवाल बन गया और सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि मैं हकलाता था और आज भी हकलाता हूं पापा की कंपनी में मुझे मार्केटिंग का काम मिला और स्कूल में भी ऑफिशियल वर्क मिला पर दोनों में पब्लिक डीलिंग ही थी मेरे पास कोई और विकल्प नहीं था ना मैं किसी के ऊपर दोषारोपण कर सकता था ना इस जिम्मेदारी से मुंह मोड़ सकता था अपने हकलाने के साथ मैंने इन सब का सामना करना शुरू किया बिजनेस को ऑफलाइन करें या ऑनलाइन करें कम्युनिकेशन तो करनी ही होती है ना सिर्फ कम्युनिकेशन बल्कि कंप्लेन  भी हैंडल करती होती हैं लोगों को समझाना भी होता है लोगों से डांट भी खानी पड़ती है स्कूल में  सुबह 8:00 बजे से 10:00 बजे तक पेरेंट्स की कंप्लेन और उनके सुझाव सुनते  थे और 10:00 बजे से लेकर शाम को 6:00 बजे तक कंपनी वालों की कंप्लेंट सुनते थे उसे आर्डर लेते थे और उनको कन्वेंस करने की कोशिश करते थे प्रतिदिन  का मेरा रूटीन था सुबह 8:00 से  10:30 तक स्कूल देखना उसके बाद 11:00 बजे से शाम को  6 :00 बजे तक बाइक लेकर फील्ड में रहते थे अभी भी रहते हैं अलग अलग कंपनी  विजिट करना अपने प्रोडक्ट को बताना उनसे ऑर्डर लेना दिन भर में बहुत सी कंप्लेंट सुनने को मिली जाती थी डांट भी सुन लेते थे  कुछ कस्टमर अच्छे से बात कर  लेते थे  कुछ तो बात ही करना पसंद नहीं करते थे | कुछ की सलाह होती थी की आपको हकलाने की दिकत है किसी और को मार्केटिंग करने देते | कुछ आर्डर दे देते थे | कुछ कस्टमर को ८-१० महीने फ़ॉलोअप लेने के बाद भी आर्डर नहीं दिए  | तो कुछ पहली बार में ही बिज़नेस दे देते थे | ऐसा ४-५  महीने करने के बाद मेरा बिज़नेस रन कर गया. |  सबसे अच्छी बात है की मै हकलाने के बाबजूद चार साल से  मार्केटिंग  कर रहा हु | स्कूल में पब्लिक डीलिंग कर रहा हु और  मुझे खुशी  है की अपने फॅमिली और बिज़नेस की रिस्पांसिबिलिटी को निभा पा रहा हु | इसका बहुत बड़ा श्रेय दिल्ली सेल्फ हेल्फ ग्रुप और टीसा को जाता है जो २०११ से २०१४ लास्ट तक ३ कम्युनिकेशन वर्कशॉप, एक नेशनल कांफ्रेंस और ७ ० से ज्यादा मीटिंग दिल्ली सेल्फ हेल्प ग्रुप के साथ मिलकर किया | कुछ वर्कशॉप चंडीगढ़ और देहरादून में अटैंड किया | 

 बाकि अगले पोस्ट में. . . . . .

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